Noida मेदांता
Noida मेदांता – द मेडिसिटी, नोएडा के डॉक्टरों ने कई गंभीर कोमॉर्बिडिटीज से पीड़ित 70 वर्षीय बुजुर्ग मरीज में पाए गए एक दुर्लभ और संभावित रूप से जानलेवा इलियल ट्यूमर का सफल इलाज किया है।
यह केस समय पर सही जांच, एडवांस्ड इमेजिंग और मल्टीडिसिप्लिनरी सर्जिकल केयर की अहमियत को दर्शाता है।मरीज पिछले करीब डेढ़ साल से लगातार कमजोरी, भूख न लगना, सांस फूलना और पेट दर्द जैसी समस्याओं से जूझ रहे थे। उनकी मेडिकल हिस्ट्री काफी कॉम्प्लेक्स थी, जिसमें डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हाइपोथायरॉइडिज्म और मायस्थीनिया ग्रेविस शामिल थे। इस दौरान उनके हीमोग्लोबिन का स्तर बार-बार गिरता रहा और उन्हें लगभग 15 यूनिट ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ी, जिससे शरीर के अंदर लगातार ब्लीडिंग की आशंका बनी रही।किडनी फंक्शन प्रभावित होने के कारण डॉक्टरों ने सीटी स्कैन की जगह एमआर एंटरोग्राफी कराने का निर्णय लिया। जांच में स्मॉल इंटेस्टाइन के मिड-इलियम हिस्से में दीवार मोटी होने का संदेहजनक क्षेत्र दिखाई दिया, जिससे ट्यूमर की संभावना स्पष्ट हुई।
विस्तृत जांच और काउंसलिंग के बाद सर्जरी की योजना बनाई गई।मामले पर जानकारी देते हुए, मेदांता हॉस्पिटल नोएडा के जीआई सर्जरी एवं जीआई ऑनकोसर्जरी विभाग के डायरेक्टर डॉ. विवेक टंडन ने कहा “यह केस इसलिए चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मरीज लंबे समय से अस्पष्ट लक्षणों और कई बीमारियों से पीड़ित थे। स्मॉल बाउल ट्यूमर दुर्लभ होते हैं और अक्सर देर से डायग्नोज होते हैं। किडनी की समस्या को देखते हुए एमआर एंटरोग्राफी का चयन बेहद अहम रहा, जिससे ट्यूमर की सही पहचान हो सकी। सावधानीपूर्वक सर्जिकल प्लानिंग और प्रिसिशन के साथ ट्यूमर को पूरी तरह हटाया गया, जिससे मरीज की रिकवरी सुचारू रही।पहले डायग्नोस्टिक लैप्रोस्कोपी के जरिए ट्यूमर की पुष्टि की गई, जिसके बाद छोटे लैप्रोटॉमी चीरे से उसे निकाला गया।
सर्जरी के दौरान मिड-इलियम में लगभग 4×4 सेमी का मिक्स्ड सॉलिड-सिस्टिक मास पाया गया, जो इलियोसीकल जंक्शन से करीब तीन फीट दूर था और पास के मेसेंटरी से जुड़ा हुआ था। प्रभावित आंत के हिस्से को हटाकर हैंड-सीन, साइड-टू-साइड एनास्टोमोसिस के जरिए आंत की कंटिन्युइटी बहाल की गई।सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी बिना किसी जटिलता के हुई और उन्हें स्थिर स्थिति में डिस्चार्ज कर दिया गया। हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट में लेयोमायोसारकोमा की पुष्टि हुई, जो स्मूद मसल सेल्स से उत्पन्न होने वाला एक दुर्लभ कैंसर है। मेडिकल ऑन्कोलॉजी टीम के साथ चर्चा के बाद मरीज को क्लोज सर्विलांस में रखा गया। फॉलो-अप में उनका हीमोग्लोबिन स्तर बढ़कर 13 ग्राम/डीएल तक पहुंच गया और उनकी सेहत में लगातार सुधार देखा गया।मेदांता हॉस्पिटल नोएडा के जीआई सर्जरी एवं जीआई ऑनकोसर्जरी विभाग के डायरेक्टर डॉ. दीपक गोविल ने कहा “स्मॉल इंटेस्टाइन का लेयोमायोसारकोमा बेहद दुर्लभ होता है और क्लियर मार्जिन के साथ सर्जरी ही इसका एकमात्र क्योर है।
ऐसे बुजुर्ग मरीजों में, जिनकी मेडिकल हिस्ट्री जटिल हो, मल्टीडिसिप्लिनरी अप्रोच बेहद जरूरी होती है। आज मरीज पूरी तरह लक्षण-मुक्त है, उनकी एनीमिया की समस्या खत्म हो चुकी है और उनकी क्वालिटी ऑफ लाइफ में बड़ा सुधार आया है, जो पूरी टीम के लिए बेहद संतोषजनक है।स्मॉल बाउल ट्यूमर बहुत कम पाए जाते हैं और सारकोमा सभी एडल्ट कैंसर मामलों में एक प्रतिशत से भी कम होते हैं। ये अक्सर पेट दर्द या क्रॉनिक एनीमिया जैसे अस्पष्ट लक्षणों के साथ सामने आते हैं।
मेदांता नोएडा में यह सफल इलाज दर्शाता है कि एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स, एक्सपर्ट सर्जिकल केयर और समन्वित फॉलो-अप के जरिए दुर्लभ गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर का प्रभावी प्रबंधन संभव है।
YouTube:@noidasamachar
Facebook:@noidasamachar
Twitter:@noidasamacharh
